दर-ओ-दीवार पे लिखी है
उस एक पहर की याद,
घर छोड़ कर चले थे
जब अनजानी राह पर.
उस पहर से मलाल नहीं
न उस शक्स से है गिला
कोई बस अगर बता जाता
क्या जुर्म किया था .
चाहते थे सिर्फ़ इतना
की बुडापा गुज़र जाए,
उस घर के दरवाज़े से
मयत ही निकल जाए ।
अब बेठे है इस सूने से मकान में
घर जो न बन सका है
इतने भी बरस मैं .