Saturday, November 28, 2009

घर

दर-ओ-दीवार पे लिखी है

उस एक पहर की याद,

घर छोड़ कर चले थे

जब अनजानी राह पर.

उस पहर से मलाल नहीं

न उस शक्स से है गिला

कोई बस अगर बता जाता

क्या जुर्म किया था .

चाहते थे सिर्फ़ इतना

की बुडापा गुज़र जाए,

उस घर के दरवाज़े से

मयत ही निकल जाए ।

अब बेठे है इस सूने से मकान में

घर जो न बन सका है

इतने भी बरस मैं .

Thursday, November 26, 2009

Kuch sahi, kuch nahin..

फतूर फुर्सत में उभरता है
ऐसी फुर्सत हमें दरकार नहीं ,
कुछ सही कुछ अनकही बातें
कहने को दिल मचलता है