लडखडाते कदमों की आहट
एक सूनी सी राह पर ,
मन के किसी कौने को
खटखटाने लगी .
एक बचपन जो खो गया ,
एक धुंदली सी चादर ओढ़ के सो गया .
नीद खुली तो देखा ,
एक में ,
एक अनजान शहर,
कुछ लोग मेरे साथ ,
कुछ का छूटा साथ .
फिर भी मन है के मानता ही नहीं
जिद्द करता है
उसी और मुड़ने को
मजबूर करता है ।
जाऊं या न जाऊं ,
क्या करूँ कोई बतलाया यहाँ ..
एक सूनी सी राह पर ,
मन के किसी कौने को
खटखटाने लगी .
एक बचपन जो खो गया ,
एक धुंदली सी चादर ओढ़ के सो गया .
नीद खुली तो देखा ,
एक में ,
एक अनजान शहर,
कुछ लोग मेरे साथ ,
कुछ का छूटा साथ .
फिर भी मन है के मानता ही नहीं
जिद्द करता है
उसी और मुड़ने को
मजबूर करता है ।
जाऊं या न जाऊं ,
क्या करूँ कोई बतलाया यहाँ ..