Friday, December 18, 2009

लडखडाते कदमों की आहट
एक सूनी सी राह पर ,
मन के किसी कौने को

खटखटाने लगी .

एक बचपन जो खो गया ,

एक धुंदली सी चादर ओढ़ के सो गया .

नीद खुली तो देखा ,

एक में ,

एक अनजान शहर,

कुछ लोग मेरे साथ ,

कुछ का छूटा साथ .

फिर भी मन है के मानता ही नहीं

जिद्द करता है

उसी और मुड़ने को

मजबूर करता है ।

जाऊं या न जाऊं ,

क्या करूँ कोई बतलाया यहाँ ..






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