रूह तड़प उठती है
निगाहें यार से तीर जब
निकलता है ।
सांसुओं की सरगोशी
कुछ कहती है
कुछ सुनती है।
ख़ास सी कोई बात कहने को
होंठ खुलते तो हैं
साँस नब्ज़ की तरह
फ्द्फ्दाती भी है
कदम बड़ते है
सूनी सी राह पर .
पर देखो तो
किस बेफिक्री से
पहलु से गुज़र वो गया
उम्मीद बांधे हम
देखते रहे ।
शमा जल के
बुज भी गई
ab zara agla post bhi likho pls...
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