दिल का सकून
आंखूं का चैन
रूह का आराम
सभी कुछ है ज़िन्दगी में
एक हुक सी दिल में फिर भी उठती है क्यूँ?
सोचती हूँ कई बार
मेरी सोच उड़कर बठेती है
किसी ऊँची शाख पर
मेरे खावाबुं से भी ऊँची
सोचती हूँ कि
टूट कर शाख से जो पत्ता गिरा
उसे उठाने कोई क्यूँ नहीं आता?
जो फूल मुर्जा जाता
वो दिल को बहला क्यूँ नहीं देता ?
याद किसी की
दिल के किसी कौने में कुरेदती है क्यूँ ?
पंख फेलाकर उड़ने को
कोई झोंका हवा का लिपटता नही क्यूँ ?
सभी कुछ तो है
और कुछ भी नहीं.......
I didn't know you had this in you...Outstanding!!
ReplyDeletethe last 2 lines.. said it all.
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